बस्ती जनपद में त्रि–स्तरीय पंचायत चुनाव की आहट अब गांव–गांव में साफ़ सुनाई देने लगी है। माहौल ऐसा कि मानो पूरा जनपद चुनावी उमंग से सराबोर हो चुका हो। ग्राम पंचायतों में हलचल इस कदर बढ़ गई है कि किसी भी चौपाल पर बैठ जाइए—मुख्य चर्चा एक ही मिलती है:“आरक्षण का निर्णय कब आएगा?”आरक्षण की स्थिति स्पष्ट न होने से संभावित प्रत्याशियों में बेचैनी चरम पर है।जो दावेदार पुनः चुनावी मैदान में उतरने के लिए कमर कस चुके थे, अब चिंता में डूबे हैं कि कहीं आरक्षण का परिवर्तन उनकी राह में बाधा न बन जाए।

सबको डर बस इतना है—“कहीं अंतिम सूची में नाम कट न जाए।”इधर, चुनाव का वातावरण बनते ही गांवों में एक अलग ही दृश्य देखने को मिल रहा है।संभावित प्रत्याशी अचानक जनसेवा में अत्यधिक सक्रिय हो उठे हैं।गांव के बुजुर्गों के चरण स्पर्श, महिलाओं से सम्मानपूर्ण संबोधन, बच्चों के साथ घुल-मिल जानाइन सबके पीछे भाव बस इतना ही दिखाई देता है कि जनता के मन में अपनी जगह मजबूत कर ली जाए।ग्रामीण भी इस बदले व्यवहार पर ठहाके लगाते दिखते हैं।कहीं कोई “चाचा-चाची” बनकर सम्मान पा रहा है,तो कहीं “बाबा-दादी” कहकर अपनापन जताया जा रहा है।गांव वालों की चुटकी भी लाजवाब—“चुनाव आते ही सबका मन बड़ा कोमल हो जाता है।”इस बीच, सर्द मौसम भी पूरी तरह दस्तक दे चुका है।अलाव जल रहे हैं, और अलाव के चारों ओर बैठे ग्रामीण चुनावी चर्चा में ऐसे खो जाते हैं मानो कोई लोकसभा सभा चल रही हो।चिंगारी की तपिश और ताज़ी हवा के बीच, पंचायत की राजनीति की बिसात बिछाना इस समय गांवों का सबसे प्रिय काम बन गया है।उधर यह समाचार कि जनपद में मतपत्र पहुँचने शुरू हो गए हैं, संभावित प्रत्याशियों की बेचैनी और बढ़ा रहा है।अब हर किसी की निगाहें टिकी हैं—“आरक्षण की अंतिम सूची कब आएगी?”“कौन किस्मत आजमाएगा और किसकी आशाएँ इसी सर्दी में ठिठुर जाएँगी?”चुनाव की दस्तक ने बस्ती के गांवों में फिर से गर्माहट और हलचल भर दी है।अब बस प्रतीक्षा है—अंतिम सूची आने की।उसके बाद ही तय होगा कि किसके हिस्से में नेतृत्व का अवसर आएगा और किसकी आकांक्षाएँ धुंध की तरह उड़ जाएँगी।
परमानन्द मिश्रा की रिपोर्ट
AKP News 786
