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30 Nov 2025, Sun

इलाज या कारोबार? अस्पतालों में जिंदगी नहीं, मुनाफा बिक रहा है!

महंगी दवाइयाँ — इलाज नहीं, मुनाफाखोरी का जलता हुआ बाज़ार
देश में स्वास्थ्य व्यवस्था आज जिस मोड़ पर खड़ी है, वहाँ बीमारी से कम और इलाज से ज्यादा डर लगता है। अस्पताल अब सेवा के केंद्र नहीं, बल्कि कारोबार के शो–रूम बन चुके हैं। मरीज इंसान नहीं, बल्कि एक “बिल नंबर” में बदल चुका है — और दवाइयों की कीमतें अब जीवन नहीं, मुनाफे का तराज़ू नापने में इस्तेमाल हो रही हैं।


सबसे बड़ा सवाल —
इलाज का अधिकार क्या अब केवल उनके लिए है जिनके पास पैसा है?
आज यह कड़वी सच्चाई किसी से छिपी नहीं कि —
💊 दवाइयाँ जीवन बचाने के लिए कम, जेब खाली कराने के लिए ज्यादा लिखी जाती हैं।
मेडिकल स्टोर्स से लेकर बड़े अस्पतालों तक एक ही खेल चल रहा है —
ब्रांडेड दवाइयाँ जोर–शोर से बेची जाएं, और सस्ती जेनेरिक दवाइयाँ दबकर रह जाएं।
क्यों?
क्योंकि जहाँ मरीज को राहत मिलती है, वहाँ डॉक्टरों और कंपनियों को फायदा नहीं मिलता।
और जहाँ “कमीशन” और “प्रमोशन” मिलते हैं, वही दवाइयाँ प्रिस्क्रिप्शन बन जाती हैं।
अस्पताल “इलाज” कम और “मार्केटिंग” ज्यादा कर रहे हैं।
डॉक्टर की पेन से लिखी दवा असल में मरीज के लिए नहीं — कंपनी के लिए लिखी जाती है।
कितनी विडंबना है —
अस्पताल में दवा उपलब्ध होने के बावजूद मरीज को बाहर के मेडिकल स्टोर भेजा जाता है,
क्योंकि वहाँ से “रिटर्न” मिलता है।
मरीज की मजबूरी, अब “बिजनेस मॉडल” बन चुकी है।
इलाज के बाद मरीज बीमारी से तो बच भी जाए,
लेकिन कर्ज़ की बीमारी दुनिया भर के भार बनकर चिपक जाती है।
गरीब और मध्यम वर्ग इलाज के नाम पर उम्र भर की कमाई लुटाने को मजबूर हैं —
और सरकार के पोस्टर, दावों और पुरस्कारों में जनता कहीं खो जाती है।
आखिर यह हेल्थ सिस्टम किसका है?
सरकार का? कॉरपोरेट हॉस्पिटल्स का? दवा कंपनियों का?
क्यों मरीज हमेशा आखिरी कतार में खड़ा मिलता है?
कागजों पर लिखा है — “आरोग्य”
लेकिन जमीनी हकीकत कहती है — “व्यापार”
आज जरूरत सिर्फ नए अस्पताल बनाने की नहीं,
मानवीय संवेदनाओं की पुनर्स्थापना की है।
अगर सच में स्वास्थ्य जनता के लिए है, तो सबसे पहले होना चाहिए —
🔹 जेनेरिक दवाइयों को अनिवार्य और सुलभ बनाया जाए
🔹 दवा कंपनियों के मुनाफे की सीमा तय हो
🔹 डॉक्टर–कंपनी गठजोड़ पर कठोरतम कार्रवाई हो
🔹 अस्पताल फार्मेसी और मेडिकल स्टोर्स पर कड़ी निगरानी हो
बीमारियाँ जीवन का हिस्सा हैं —
पर इलाज को व्यापार का हिस्सा बनने की अनुमति देना मानवता के खिलाफ अपराध है।
आज सवाल सरकार से भी है, सिस्टम से भी — और हम सब से भी —
क्या हम स्वास्थ्य को मानवीय अधिकार बनाने की दिशा में कदम उठाएँगे
या इलाज हमेशा तिजोरी के तराज़ू में तौला जाता रहेगा?
क्योंकि याद रखिए —
जब दवा व्यापार बन जाती है,
तो मरीज ग्राहक बन जाता है —
और इंसान कहीं खो जाता है।

सूफ़ी एजाज़ आलम खान क़ादरी

संपादक- AKP News 786

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