
Governor Reserve Bill Supreme Court विवाद पर देशभर में मची हलचल — जानिए पूरी रिपोर्ट
देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा संवैधानिक प्रश्न खड़ा हो गया है। विधानसभा द्वारा पास किए गए बिल को राज्यपाल द्वारा रिज़र्व कर राष्ट्रपति के पास भेजने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि “Governor Reserve Bill Supreme Court” मामला अब सिर्फ एक कानूनी बहस नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारियों की सीमाओं का परीक्षण बन चुका है।
🔍 क्या है पूरा मामला?
राज्य की विधानसभा ने एक महत्वपूर्ण बिल दोबारा पास करके राज्यपाल को भेजा था।लेकिन राज्यपाल ने इस पर हस्ताक्षर करने के बजाय उसे Reserve करके राष्ट्रपति के पास भेज दिया।इसी को लेकर यह प्रश्न उठा कि —क्या राज्यपाल के पास ऐसा करने का अधिकार है?क्या विधानसभा द्वारा दोबारा पास किए गए बिल पर साइन करना उनकी बाध्यता थी?इन्हीं सवालों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में Presidential Reference दाखिल किया गया है।
🏛️ सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि—
“राज्यपाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया के पहरेदार हैं, कोई समानांतर सत्ता केंद्र नहीं। विधानसभा द्वारा पास बिल को अनिश्चितकाल तक रोका नहीं जा सकता।”
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर राज्यपाल बिना ठोस कारण के बिल को रोकते हैं, तो यह संवैधानिक प्रक्रिया को बाधित करने के समान है।
📘 Assembly का stand
विधानसभा का कहना है कि जनता द्वारा चुनी हुई सरकार ने विचार-विमर्श के बाद यह बिल पास किया है।
इसलिए राज्यपाल को इसे मंजूरी देनी चाहिए थी, न कि रास्ता रोके बिना Reserve करना चाहिए था।
📝 अब अगला कदम क्या?
राष्ट्रपति भवन में बिल की फाइल लंबित है और अब सुप्रीम कोर्ट की राय अहम होगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट का यह निर्णय आने वाले समय में—
राज्यपाल की सीमाएँ
विधानसभा के अधिकार
और राष्ट्रपति के विवेकाधिकार
तीनों पर ऐतिहासिक प्रभाव छोड़ेगा।
🔥 क्यों वायरल हो रहा है मामला?
यह सीधा सवाल उठाता है कि क्या राज्यपाल सरकार की मर्जी के खिलाफ बिल रोक सकते हैं?
क्या केंद्र और राज्य के बीच सत्ता संतुलन बदल रहा है?
और सबसे बड़ी बात—
क्या सुप्रीम कोर्ट अब राज्यपालों की शक्तियों पर एक नया पैमाना तय करने वाला है?
AKP News 786 की राय
यह मामला लोकतांत्रिक ढांचे की आत्मा से जुड़ा है।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट की राय आने वाले समय में देश की राजनीति और प्रशासन दोनों को नई दिशा दे सकती है।
अगर आप इस मुद्दे को फॉलो कर रहे हैं तो हमारी अपडेट्स पर नज़र बनाए रखें—
यह विवाद सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक भविष्य का सवाल बन चुका है।
