संपादकीय
बस्ती : जनवरी की कड़ाके की ठंड बस्ती शहर के आमजन के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं है। शीतलहर के इस दौर में जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत राहत और संवेदनशीलता की होती है, तब शहर के प्रमुख चौराहों पर अलाव की अनुपस्थिति प्रशासनिक उदासीनता को उजागर करती है। ठंड से ठिठुरते गरीब, मजदूर और राहगीर खुले आसमान के नीचे राहत की आस लगाए खड़े हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत काग़ज़ी दावों से कोसों दूर है।
नगर पालिका के रिकॉर्ड में अलाव “भरपूर” जल रहे हैं, पर सच्चाई यह है कि ये अलाव फाइलों और रजिस्टरों तक ही सीमित हैं। जिन संसाधनों का अधिकार सबसे ज़्यादा ज़रूरतमंदों को मिलना चाहिए, वही सुविधाएँ खास लोगों की चौखट तक सिमट कर रह गई हैं। यह न सिर्फ़ प्रशासनिक विफलता है, बल्कि सामाजिक न्याय पर भी सीधा प्रहार है।
सवाल यह नहीं कि बजट जारी हुआ या नहीं, सवाल यह है कि क्या ठंड से कांपते गरीब तक उसकी गर्माहट पहुँची? यदि जवाब ‘न’ है, तो व्यवस्था को आत्ममंथन करना होगा। राहत योजनाएँ दिखावे के लिए नहीं, ज़रूरतमंदों की जिंदगी बचाने के लिए होती हैं। अब समय है कि नगर पालिका काग़ज़ों से निकलकर ज़मीन पर उतरे—वरना ठंड के साथ-साथ जनता का भरोसा भी जमकर ठंडा पड़ जाएगा।
