उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद से होकर बहने वाली कुआनो नदी, जो कभी क्षेत्र की जीवनरेखा और सांस्कृतिक धरोहर मानी जाती थी, आज गंभीर संकट से जूझ रही है। ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व से जुड़ी यह नदी अब जलकुंभी के बढ़ते प्रकोप और प्रदूषण की चपेट में है।
पौराणिक और ऐतिहासिक पहचान
कुआनो नदी का उद्गम बहराइच जनपद के बराऊपुर गाँव के ‘रोहुआ’ नामक कुएँ से माना जाता है। यह घाघरा नदी की प्रमुख सहायक नदी है, जो बस्ती के पास से होकर गुजरती है। यह क्षेत्र महर्षि वशिष्ठ की तपोभूमि के रूप में प्रसिद्ध रहा है। मान्यता है कि भगवान राम की बहन शांता देवी का मंदिर और राजा दशरथ द्वारा पुत्रेष्ठि यज्ञ का स्थल मखौड़ा धाम इसी नदी के आसपास स्थित है।
ब्रिटिश काल में बने अमहट पुल का निर्माण लगभग 100 वर्ष पहले अंग्रेज अधिकारी एम. ए. हाट द्वारा कराया गया था, जो आज भी इस नदी के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है।
कृषि और व्यापार की धुरी
कुआनो नदी बस्ती, गोंडा और आसपास के क्षेत्रों के लिए सिंचाई का प्रमुख स्रोत रही है। साथ ही, यह जल परिवहन और रेत खनन के माध्यम से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी सहारा देती रही है।
साहित्य में भी पहचान
प्रसिद्ध हिंदी कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने कुआनो नदी के माध्यम से समाज के गरीब और उपेक्षित वर्ग की पीड़ा को व्यक्त किया है, जिससे यह नदी एक मजबूत सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में उभरी।
बढ़ता संकट: जलकुंभी का कहर
वर्तमान में नदी पर जलकुंभी (Water Hyacinth) तेजी से फैल रही है। यह खर-पतवार पानी की सतह को पूरी तरह ढक देता है, जिससे ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इसके कारण मछलियों का जीवन संकट में पड़ता है, जलमार्ग अवरुद्ध होता है और मच्छरों का प्रजनन तेजी से बढ़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि समय रहते इस समस्या पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो कुआनो नदी पूरी तरह जलकुंभी से ढक सकती है।
बड़ा सवाल
आखिर कब तक बस्ती की इस ऐतिहासिक नदी को यूं ही संकट में छोड़ दिया जाएगा?
क्या प्रशासन और समाज मिलकर इसे बचाने के लिए ठोस कदम उठाएंगे?
संकलनकर्ता – परमानन्द मिश्र
