AKP News 786 – जन-स्वास्थ्य सत्याग्रह मुहिम
जन-स्वास्थ्य सत्याग्रह मुहिम के तहत श्रीकृष्ण पाण्डेय इंटर कॉलेज बस्ती के सामने स्थित सद्भावना हॉस्पिटल पर हमारे सहयोगी परमानन्द मिश्रा पहुंचे, जहाँ से मिश्रा जी ने ग्राउंड रिपोर्ट दिया।
सद्भावना हॉस्पिटल केवल नाम बड़ा—काम कितना? यही जानने के इरादे से जब टीम पहुँची तो दृश्य चौंकाने वाला था।
स्वास्थ्य विभाग की निगाहें चकमा खाए हुए हैं या चकमा दिलाया जा रहा है—यह कहना मुश्किल है, लेकिन बंद नियमों के दरवाजे के पीछे 24 घंटे इलाज जरूर चल रहा है।
खुले में नहीं… एक सिमटे हुए दायरे में—सिर्फ दो छोटे-छोटे वार्ड, ताकि सुविधा का भ्रम भी रहे और सच्चाई भी छिपी रहे।
बाहर लगा बोर्ड आधा टूटा है— उस पर बड़े अक्षरों में सिर्फ “भावना” लिखा दिखाई देता है। पूरा नाम “सद्भावना” कहाँ खो गया?
क्या बोर्ड टूटा है… या नियमों की रीढ़?
अस्पताल के नाम के अनुसार न एंबुलेंस, न मानक मेडिकल सुविधाएँ, न बुनियादी स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर। तस्वीर साफ है— मरीज आते हैं भरोसा लेकर… लेकिन लौटते हैं अनुभव लेकर। वह अनुभव मीठा है या कड़वा—यह वही जानते हैं।
जब अंदर की वास्तविकता जानने की कोशिश की, तो प्रवेश पर मौजूद कर्मी ने बिल्कुल सधी आवाज़ में कहा— “डॉक्टर साहब सो रहे हैं।”
यहीं से शुरू होते हैं बड़े सवाल —
- क्या यह सच में सद्भावना है या सेवा के नाम पर कारोबार?
- क्या यह अस्पताल है या दुकाननुमा इलाज व्यवस्था?
- क्या स्वास्थ्य विभाग की आँखों पर पट्टी बाँध दी गई है… या विभाग खुद ही अनदेखी कर रहा है?
मरीजों की जान किसी प्रयोगशाला की चीज़ नहीं होती। कागज़ों और बोर्डों से अस्पताल नहीं चलते—ज़मीनी सुविधा चाहिए, पारदर्शिता चाहिए और नियमानुसार सेवा चाहिए।
यदि दरवाजे पर लटका शब्द सिर्फ “भावना” रह गया हो, और “सद्भावना” कहीं खो गई हो, तो यह सिर्फ बोर्ड का नहीं—व्यवस्था का टूटना है।
AKP News 786 की निरंतर पड़ताल
AKP News Seven Eight Six आगे भी इस हॉस्पिटल की वास्तविकता, रसूख, और विभाग की कार्यवाही—या चुप्पी—पर रिपोर्टिंग जारी रखेगा। क्योंकि सवाल जनता के स्वास्थ्य का है। और इस सवाल से बड़ा कोई सवाल नहीं।
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