एस.आर.एन. चिकित्सालय का नाम अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर करने और आज़ाद पार्क का प्रवेश शुल्क समाप्त करने की उठी ज़ोरदार मांग
बस्ती/प्रयागराज।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अमर स्मृतियों को सहेजने और नई पीढ़ी को शहीदों की चेतना से जोड़ने के उद्देश्य से महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा आयोजित ‘शहादत से शहादत तक’ तीन दिवसीय कार्यक्रम का भावनात्मक और वैचारिक रूप से सशक्त दूसरा दिन प्रयागराज में संपन्न हुआ। अमर शहीद राजेंद्रनाथ लाहिड़ी के बलिदान दिवस 17 दिसंबर से प्रारंभ यह आयोजन अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान दिवस तक चला, जिसमें इतिहास, वर्तमान और भविष्य के सवाल एक साथ उठे।

कार्यक्रम के द्वितीय दिवस 18 दिसंबर 2025 को अपराह्न 3 बजे अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान स्थल—पूर्व मलाका जेल परिसर, वर्तमान एस.आर.एन. हॉस्पिटल—में विचार–विमर्श सत्र आयोजित किया गया। इसके पश्चात अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद पार्क तक मशाल जुलूस निकालकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। मशाल सलामी क्रांतिकारी वंशज उत्तम कुमार बनर्जी के नेतृत्व में संपन्न हुई।
विचार–विमर्श सत्र में वक्ताओं ने स्वतंत्र भारत में शहीद स्थलों पर प्रवेश शुल्क लगाए जाने को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए कहा कि जिस आज़ादी के लिए क्रांतिकारियों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए, उसी आज़ादी में उनकी स्मृतियों तक पहुंचने के लिए टिकट व्यवस्था जनता की भावनाओं पर चोट है। विशेष रूप से चंद्रशेखर आज़ाद पार्क में स्कूली बच्चों से भी शुल्क वसूले जाने पर तीखी आपत्ति जताई गई।

वक्ताओं का कहना था कि यदि प्रशासन पूरे पार्क के रखरखाव हेतु टिकट प्रणाली लागू करना चाहता है तो यह अलग विषय हो सकता है, लेकिन शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की प्रतिमा, प्रांगण और शहादत स्थल तक निःशुल्क पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए। शहीदों को नमन करने पर कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता।
इतिहास के प्रसंगों को याद करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आज़ाद की शहादत के बाद जिस जामुन के पेड़ के पास उन्होंने स्वयं को बलिदान किया था, वह जनता की आस्था का केंद्र बन गया था। अंग्रेजी हुकूमत ने उस प्रेरणा को कुचलने के लिए पेड़ को कटवाया और उसकी जड़ों तक को जलवाया, लेकिन क्रांतिकारी चेतना को समाप्त नहीं कर सकी। आज यदि शुल्क के माध्यम से शहादत स्थलों को आमजन से दूर किया जा रहा है, तो यह उसी मानसिकता की पुनरावृत्ति प्रतीत होती है।
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि वर्षों से आज़ाद पार्क में शहादत से जुड़े मेले और आयोजन होते रहे हैं, जिनसे नई पीढ़ी इतिहास से जुड़ती रही। यदि शुल्क लगाकर इन परंपराओं को सीमित किया गया, तो यह राष्ट्र की स्मृति पर आघात होगा।

वक्ताओं ने ठाकुर रोशन सिंह के व्यक्तित्व और विचारों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका नाम ही नहीं, उनके विचार भी आज की पीढ़ी को रोशन करने वाले हैं। फांसी से पूर्व मलाका जेल में लिखे गए उनके पत्र आज भी महुआ डाबर संग्रहालय में सुरक्षित हैं, जो उनके वैचारिक तेज और राष्ट्रभक्ति की जीवंत मिसाल हैं।
इस अवसर पर यह मांग भी प्रमुखता से उठी कि जिस मलाका जेल में ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दी गई, वही स्थल आज एस.आर.एन. मेडिकल कॉलेज परिसर का हिस्सा है। ऐसे में आज़ादी के अमृत काल में एस.आर.एन. चिकित्सालय का नामकरण अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर किया जाना उनके बलिदान का सच्चा सम्मान होगा।
