संपादकीय — राजनीति बनाम SIR 2025 : सत्ता की चाह और सत्यापन की राह
भारत के लोकतंत्र की विडंबना देखिए—

राजनीति हर मतदाता को अपने लिए ज़रूरी मानती है,
लेकिन SIR 2025 हर मतदाता को राष्ट्र के लिए ज़रूरी साबित करना चाहता है।
चुनावी मंचों पर नेता जनता को “लोकतंत्र का मालिक” बताते हैं,
लेकिन मतदाता सूची को सही करने वालों की हालत मालिक नहीं, मज़दूर जैसी है।
और सबसे अधिक हैरानी तब होती है जब राजनीति के हाथ में माइक होता है,
और SIR के वर्कर के हाथ में पोर्टल, दस्तावेज़ और डेडलाइन।
▪ राजनीति — समर्थकों की गिनती बढ़ाने में लगी
▪ SIR — सही नागरिकों की पहचान सुनिश्चित करने में
एक ओर नेताओं के भाषणों में देश बदलने के शोर हैं,
दूसरी ओर BLO के फोन में दिन-रात “उपडेट कब होगा?”, “लिस्ट क्यों रुकी?”,
“हाजिरी लग गई?”, “फील्ड रिपोर्ट भेजो” जैसी सख्त आवाज़ें।
राजनीति का हथियार नारे हैं,
SIR का हथियार डेटा।
राजनीति भावनाओं पर चलती है,
SIR तथ्यों पर।
इसीलिए टकराव अनिवार्य है।
और इस टकराव के बीच सबसे ज्यादा किस पर प्रहार होता है?
वही कर्मचारी, जिसने राजनीति नहीं— राष्ट्रहित के लिए दस्तावेज़ अपडेट किए।
जिन गलियों में नेता वोट मांगते हैं,
उन्हीं गलियों में BLO दस्तावेज़ मांगते हैं—
पर अंतर बहुत बड़ा है:
वोट देना आसान है, पर दस्तावेज़ दिखाना कठिन लगता है।
कड़वी सच्चाई यह भी है कि—
यदि कोई फर्जी नाम हटे तो राजनीति विरोध करती है,
और यदि फर्जी नाम न हटे तो लोकतंत्र प्रभावित होता है।
सवाल यही है—
देश सत्ता से चलेगा या सत्य से?
क्योंकि सत्ता के लिए सूची संख्या चाहिए,
लेकिन लोकतंत्र के लिए सही सूची।
आज जरूरत तालियों की नहीं, ईमानदारी की है।
क्योंकि SIR 2025 सिर्फ मतदाता सूची सुधार नहीं—
लोकतंत्र की रीढ़ की मजबूती की प्रक्रिया है।
यदि देश यह नहीं समझेगा तो नुकसान चुनाव का नहीं—
देश के भविष्य का होगा।
राजनीति चुनाव जीतने की मशीन है,
SIR सत्यापित लोकतंत्र का सुरक्षा कवच।
और इतिहास गवाह है—
सत्ता कभी स्थायी नहीं होती,
लेकिन सत्य की रक्षा करने वाले हमेशा इतिहास का आदर पाते हैं।
