हिज़ाब, महिला और सत्ता: क्या यही है संवेदनशील शासन?
बिहार में आयुष प्रमाण पत्र वितरण के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक मुस्लिम महिला का हिज़ाब हटवाया जाना लोकतांत्रिक मूल्यों पर चोट जैसा है। यह सवाल केवल हिज़ाब का नहीं, बल्कि महिला की स्वायत्तता और धार्मिक स्वतंत्रता का है।

आज जब देश महिला सशक्तिकरण और अल्पसंख्यक अधिकारों की बात करता है, तब इस तरह की घटनाएँ सरकारों की कथनी और करनी के अंतर को उजागर करती हैं। किसी भी महिला की धार्मिक पहचान को सार्वजनिक मंच पर बाधित करना, उसकी गरिमा का हनन है — चाहे वह किसी भी धर्म से क्यों न हो।
सत्ता में बैठे लोगों से अपेक्षा होती है कि वे कानून के साथ-साथ संवेदनशीलता और नैतिकता का भी पालन करें। हिज़ाब हटाने जैसी कार्रवाई यह संकेत देती है कि प्रशासनिक औपचारिकता के नाम पर व्यक्तिगत अधिकारों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है — जो एक खतरनाक सोच है।
लोकतंत्र में ताक़त का असली इम्तिहान यह नहीं कि आप आदेश दे सकते हैं, बल्कि यह है कि आप कितनी इज़्ज़त दे सकते हैं। यह घटना आत्ममंथन की मांग करती है — सरकार से भी और समाज से भी।
