जब किसी देश या समाज में कानून किताबों तक सीमित रह जाए और सड़कें लापरवाही का अखाड़ा बन जाएं, तो हादसे किस्मत नहीं, व्यवस्था की विफलता बन जाते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि आज हमारी सड़कें जीवनदान की जगह कब्रगाह बनती जा रही हैं — और इसकी सबसे बड़ी वजह ओवरलोड ट्रक, ट्राली और बसों का निरंकुश संचालन है।

आंखों के सामने रोज़ ओवरलोड वाहनों के पलटने और दुर्घटनाग्रस्त होने से मासूम लोगों की जान जाती है, दर्जनों घायल होते हैं, परिवार तबाह होते हैं, पर RTO विभाग की नींद नहीं टूटती।
जनता पूछ रही है — आखिर कब तक विभाग मूकदर्शक बना रहेगा?
हादसे सड़क पर होते हैं, लेकिन जिम्मेदार कुर्सियों पर सुरक्षित बैठे रहते हैं।
सूत्रों की मानें तो ओवरलोड वाहनों पर कार्रवाई न होने का राज बेहद शर्मनाक है —
👉 विभागीय अधिकारी और कर्मचारी जेबें गर्म कर रहे हैं,
👉 मोटा पैसा लेने के बाद ओवरलोड गाड़ियों को खुली छूट मिल रही है,
👉 जब कार्रवाई की जरूरत होती है, तब फाइलों में सिर्फ खानापूर्ति का खेल चलता है।
यही कारण है कि आज ओवरलोडिंग व्यवस्था की नाक के नीचे पनपता हुआ एक संगठित कारोबार बन चुकी है। सड़क सुरक्षा कानूनों को रौंदते हुए ट्रक, ट्रालियां और बसें रफ्तार और वजन दोनों में मौत को ढोती चलती हैं — पर रोकने वाला कोई नहीं।
प्रश्न यह भी है कि
🚫 क्या विभाग को मौतों का आंकड़ा दिखाई नहीं देता?
🚫 क्या घायल होते लोग इंसान नहीं, सिर्फ संख्या हैं?
🚫 क्या सरकारी जिम्मेदारी सिर्फ ऑफिस तक सीमित है?
हादसों के बाद नारे, संवेदनाएं, कागजी कार्रवाई, सांत्वना संदेश —
और फिर सब कुछ पहले जैसा…
मानो इंसानी जीवन की कीमत गिरकर शून्य हो चुकी हो।
अब वक्त आ गया है जब ओवरलोडिंग को सिर्फ ट्रैफिक उल्लंघन नहीं, बल्कि हत्या के प्रयास की श्रेणी में देखा जाए।
कानून तभी प्रभावी होगा जब:
✔ ओवरलोड वाहन चालकों के साथ
✔ वाहन मालिक और
✔ भ्रष्ट विभागीय कर्मचारियों पर भी कठोर कार्रवाई हो।
सड़क सुरक्षा कागजों पर नहीं, जमीन पर दिखनी चाहिए —
क्योंकि सड़कें जनता की हैं, मौतों का सौदा नहीं।
यह लड़ाई सिर्फ कानून की नहीं, मानवता की रक्षा की लड़ाई है।
और जब विभाग सो जाए तो जनता को आवाज उठानी ही पड़ती है —
क्योंकि चुप्पी हमेशा अपराध के पक्ष में खड़ी होती है
समाप्त — लेकिन सवाल अभी भी ज़िंदा है:
सड़कें सुरक्षित कब होंगी?
और जिम्मेदार जगेंगे — या हादसे ही जगाएँगे?
