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30 Nov 2025, Sun

SIR 2025: देशभर में बढ़ती BLO मौतें — लोकतंत्र की नींव खतरे में

SIR 2025

सूफ़ी एजाज़ आलम खान क़ादरी

संपादकीय


SIR 2025 — संशोधन की दौड़ में बिखरती ज़िंदगियाँ
भारत का लोकतंत्र दुनिया में सबसे बड़ा माना जाता है — और इसे चलाए रखने में बूथ लेवल ऑफिसरों (BLO) की भूमिका आधार-स्तंभ जैसी है। मतदाता सूची में संशोधन से लेकर घर-घर सत्यापन तक, मतदान केंद्रों की तैयारियों से लेकर अंतिम मतदाता सूची तक, हर चरण में वही सबसे आगे खड़े होते हैं।
लेकिन विडंबना यह है कि जिनके कंधों पर लोकतंत्र की नींव टिकी है — वही आज अपने जीवन की कीमत चुका रहे हैं।


2025 के Special Intensive Revision (SIR) अभियान के दौरान देश के कई राज्यों में BLO कर्मचारियों की हार्ट अटैक, तनाव, अथाह कार्यभार और आत्महत्या के चलते मौतों की खबरें लगातार बढ़ रही हैं। कहीं कोई ज़हर खाकर मर गया, कहीं कोई ड्यूटी के दबाव में दिल की धड़कन का शिकार हो गया, और कहीं किसी ने सुसाइड नोट में लिखा कि “SIR ने मुझे मार दिया।”
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये मौतें एक राज्य या एक जिले की त्रासदी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की समस्या बन चुकी हैं।


उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात समेत कई राज्यों में BLO मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा। अपने-अपने परिवारों के कमाने वाले सदस्य अचानक इस दुनिया से चले गए — कुछ फर्ज़ पूरा करते-करते और कुछ थक चुके दिल सेआंकड़े नहीं, इंसान हैंआंकड़े नहीं, इंसान हैंआंकड़े नहीं, इंसान हैंआंकड़े नहीं, इंसान हैं लड़ते-लड़ते।

जिम्मेदारी कहां है?


जब सरकारें लोकतंत्र की रक्षा के लिए क़ानून और तंत्र बनाती हैं, तो उसी लोकतंत्र की सबसे निचली कड़ी — BLO — की सुरक्षा और सम्मान क्यों भुला दिया जाता है?
मतदाता सूची में एक गलती के लिए नोटिस, स्पष्टीकरण, चेतावनी और निलंबन तक की बातें सुनाई देती हैं, लेकिन अधिकारी वर्ग द्वारा दबाव, अपमान, बेमियादी काम के घंटे और संसाधनों की कमी पर कोई बात नहीं करता।
किसी भी प्रणाली में सुधार — मानवीय कीमत पर नहीं हो सकता।
किसी भी संशोधन अभियान की सफलता — किसी की जान से बड़ी नहीं हो सकती।

आंकड़े नहीं, इंसान हैं


हर मृत्यु के पीछे सिर्फ नौकरी नहीं गई —
एक परिवार का सहारा चला गया…
एक बच्चे का भविष्य अंधेरा हो गया…
एक बुज़ुर्ग माता-पिता की लाठी टूट गई…
और लोकतंत्र का एक सिपाही थक कर गिर गया।
SIR अभियान की गति जितनी तेज़ है, उससे कहीं ज्यादा तेज़ गति से मानवीय संवेदनाएं खत्म होती दिख रही हैं।

चुनाव आयोग और सरकार की परीक्षा


चुनाव आयोग का मुख्य उद्देश्य लोकतंत्र को मजबूत करना है।
लेकिन क्या लोकतंत्र मजबूत होगा —
जब उसी लोकतंत्र के प्रहरी दुर्बल और शोषित होते जाएं?
जरूरी है कि—
BLO को मानव संसाधन नहीं, मानवीय दृष्टि से देखा जाए
कार्यभार सीमा और ड्यूटी घंटे निर्धारित हों
स्टाफ की कमी पूरी की जाए
धमकी, दुर्व्यवहार और अपमान पर सीधी कार्रवाई हो
ड्यूटी के दौरान मौत को सेवामृत्यु का दर्जा मिले
परिवारों को मुआवजा और सरकारी नौकरी प्रदान की जाए

लोकतंत्र का असली अर्थ


लोकतंत्र सिर्फ मतदान का आयोजन नहीं —
लोकतंत्र है मनुष्य की गरिमा।
और यदि वही गरिमा खतरे में पड़ने लगे तो हर सुधार अधूरा है।
SIR अभियान की सफलता तभी मानी जाएगी,
जब बूथ लेवल पर खड़े इंसान की ज़िंदगी सुरक्षित और सम्मानजनक होगी।
वरना मतदाता सूची भले परफेक्ट हो जाए —
लेकिन लोकतंत्र अपूर्ण ही रह जाएगा।

सूफ़ी एजाज़ आलम खान क़ादरी

संपादक

AKP News 786

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