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2 Mar 2026, Mon

“पाटे गए कुएँ, सूखता सामूहिक जीवन”

By Aijaz Alam Khan

कभी गाँव की सुबह कुएँ की आवाज़ से शुरू होती थी। रस्सी की चरमराहट, घड़े के टकराने की ध्वनि और पानी की छलकती आवाज़—मानो कुआँ स्वयं बोल रहा हो। आज वही कुआँ खामोश है। न रस्सी है, न घड़ा, न पनघट की रौनक। बदलते समय के साथ गाँव के कुएँ अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं, और उनके साथ हमारी स्मृतियाँ भी जैसे सूखती जा रही हैं।


कुआँ केवल पानी का स्रोत नहीं था, वह गाँव का हृदय था। सुबह-सुबह पनघट पर पहुँची महिलाएँ, सिर पर घड़ा, होठों पर लोकगीत और बातों में ननद-भौजाई की चुहल—यह सब गाँव की आत्मा थी। कुएँ के किनारे रिश्ते गढ़े जाते थे, मन हल्के होते थे और दिन की शुरुआत मुस्कान के साथ होती थी। आज न पनघट है, न गीत—बस सीमेंट से पाटे गए कुएँ हैं और उनमें दबी हुई आवाज़ें।
भारतीय परंपरा में कुएँ का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी था। विवाह के अवसर पर बारात की विदाई के समय दूल्हे द्वारा कुएँ की परिक्रमा कराई जाती थी। यह परिक्रमा केवल एक रस्म नहीं, बल्कि प्रकृति और जल के प्रति सम्मान का प्रतीक थी। कुएँ को जीवनदायिनी शक्ति माना जाता था। आज वही रस्में किताबों और स्मृतियों तक सीमित रह गई हैं।


खेती-किसानी का जीवन भी कुएँ से जुड़ा था। ढेंकली और रहट से निकलता पानी खेतों तक पहुँचता, फसलें लहलहातीं और किसान की आँखों में उम्मीद चमकती। कुएँ का पानी मेहनत की कीमत चुकाता था। आज मोटर और बोरवेल ने जगह तो ले ली, लेकिन वह अपनापन, वह आत्मीयता कहीं खो गई।
कुआँ संकट के समय भी गाँव का सहारा था। यदि किसी घर में आग लग जाती, तो पूरा गाँव बाल्टी और घड़े लेकर कुएँ पर जुट जाता। आग बुझाना केवल एक कार्य नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी थी। कुआँ सामूहिकता का प्रतीक था—जहाँ “मैं” नहीं, “हम” हुआ करते थे।
गाँव के विवाद, पंचायत की बैठकें और बुज़ुर्गों की सलाह—सब कुएँ के आसपास ही हुआ करती थीं। कुआँ न्याय, संवाद और सामंजस्य का केंद्र था। कथाकारों और साहित्यकारों ने भी अपने लेखन में कुएँ को जीवन के प्रतीक के रूप में स्थान दिया है। कुआँ हमारी संस्कृति का मौन साक्षी था।
आज जब गाँवों में नल और टंकियाँ आ गई हैं, कुएँ उपेक्षा के शिकार हो गए हैं। जो बचे हैं, वे झाड़ियों में घिरे, टूटे किनारों के साथ बीते समय को याद कर रहे हैं। वे पूछते हैं—“क्या हमारा कसूर सिर्फ़ इतना था कि हम पुराने हो गए?”
गाँव की धरोहर के रूप में बचे एक-आध कुएँ जब दिख जाते हैं, तो मन भर आता है। वे याद दिलाते हैं कि कभी जीवन कितना सरल, कितना सामूहिक और कितना मानवीय था। सच ही है—कुएँ सूखने से पहले हमारी संवेदनाएँ सूख गईं। जाने कहाँ गए वो दिन।
परमानंद मिश्रा की कलम से
AKP News 786