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2 Mar 2026, Mon

“मुसलमानों के मौजूदा हालात — ज़िम्मेदारी किसकी और समाधान क्या?”

आज के दौर में मुसलमानों के हालात पर बात करना किसी बहस को हवा देना नहीं, बल्कि ज़मीनी हक़ीक़तों को समझना है। दुनिया बदल रही है, दौर बदल रहा है, तकनीक और ज्ञान सबसे बड़ा हथियार बन चुके हैं — लेकिन अफ़सोस कि मुसलमानों का एक बड़ा तबक़ा अब भी हालात के थपेड़ों में उलझा हुआ दिख रहा है। कभी सियासत की आंधी, कभी मअशी (आर्थिक) कमज़ोरी, कभी तालीम से दूरी और कभी दो फ़िरक़ों के दरमियान तनाफ़्फ़ुस… नतीजा यह कि पूरी क़ौम एक मनफ़रक़ा (बिखरे) समाज की तस्वीर पेश कर रही है।
सवाल उठता है — क़ुसूर किसका है?


क्या वक़्त का? क्या सियासत का? या फिर हमारी अपनी लापरवाही का?
सच यह है कि मुसलमानों पर बाहरी दबाव अपनी जगह मौजूद हैं, लेकिन सबसे बड़ा नुकसान अंदरूनी कमज़ोरियों ने पहुँचाया है।
जहाँ तालीम को फ़र्ज़-ए-ऐन समझना चाहिए था, वहाँ इसे पीछे छोड़ दिया गया।
जहाँ इल्म, हुनर और कारोबार की दुनिया में कदम मज़बूत होकर बढ़ने चाहिए थे, वहाँ शिकायत, मायूसी और इंतज़ार हावी हो गए।
जहाँ मस्जिदें रोशन हैं, वहाँ किताबख़ाने वीरान पड़े हैं।
जहाँ सोशल मीडिया पर बहसें गर्म हैं, वहाँ बच्चों के हाथों में किताबें ठंडी पड़ चुकी हैं।
मुसलमानों का मौजूदा हालात का रोना रोना काफी नहीं — इस दायरे से बाहर निकल कर हक़ीक़त को पहचानना होगा। क़ौम तभी उठेगी जब मस्जिद के मिंबर से सिर्फ़ तक़रीर नहीं, बल्कि तालीम, तर्बियत और रोशन फ़िक्र का पैग़ाम दिया जाएगा।
क़ौम तब बदलेगी जब माँ–बाप बच्चों के हाथ में मोबाइल नहीं, किताब, हुनर और मक़सद देंगे।
क़ौम तब बदलेगी जब इत्तेहाद नारों में नहीं, अमल में दिखेगा।
क़ौम तब बदलेगी जब हम दूसरों को दोष देने के बजाय अपने अंदर झाँकेंगे।
दुनिया आज तक़रीबन हर फ़ील्ड में आगे बढ़ रही है — साइंस, टेक्नोलॉजी, मेडिसिन, बिज़नेस, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस।
लेकिन मुसलमानों की एक बड़ी आबादी अब भी अतीत की यादों, फ़र्क़ों की जंग और एक-दूसरे की कमज़ोरियाँ खोजने में वक़्त जाया कर रही है। जबकि हक़ीक़त यह है कि
क़ौमों की इज़्ज़त जज़्बाती नारों से नहीं, बल्कि तालीम, एख़लाक़, मेहनत और एकता से बनती है।
अगर मौजूदा हालात बदलने हैं, तो दिशा साफ़ है:
🚩 तालीम सबसे पहले — मज़हबी भी, दुनियावी भी
🚩 हुनर और रोज़गार पर तवज्जो
🚩 सहाफ़त नहीं, इल्म और तहज़ीब की ज़बान अपनाना
🚩 फिरक़ापरस्ती छोड़कर इत्तेहाद की राह पकड़ना
🚩 नौजवानों को सिर्फ़ जज़्बा नहीं, विज़न देना
मौजूदा हालात मसला नहीं — मौजूदा सोच मसला है।
जब सोच बदलेगी, तब हालात भी बदलेंगे।
इसलिए आज ज़रूरत किसी लफ़्ज़ की जंग, किसी नारों की राजनीति की नहीं —
बल्कि एक संजीदा और हकीक़तपसंद सफ़र की है जो मुसलमानों को शिकायत के मोड से क़ामयाबी के मोड की तरफ़ ले जाए।
अंजाम शब्दों से नहीं, फ़ैसलों से बदलते हैं।
अब फैसला हमें करना है —
*हम हालात का रोना रोने वाली क़ौम बने रहेंगे या हालात बदलने वाली क़ौम बनेंगे…?

-सूफ़ी एजाज़ आलम खान क़ादरी

संपादक-AKP News 786