रूस की संसद (State Duma) ने 2 दिसंबर 2025 को Government of Russia और India के बीच हुए RELOS (Reciprocal Exchange of Logistic Support) समझौते को औपचारिक रूप से मंजूरी दे दी।

इस पाबंद समझौते को 18 फरवरी 2025 को दोनों देशों के अधिकारियों द्वारा हस्ताक्षरित किया गया था।
अब RELOS के तहत:
भारत और रूस दोनों को एक-दूसरे के सैन्य अड्डों, एयरफील्ड, नौसैनिक बंदरगाहों और अन्य सुविधाओं का उपयोग करने का अधिकार मिलेगा।
यह सुविधा युद्धपोतों, सैन्य विमानों और अन्य सैन्य टुकड़ियों के लिए होगी — जिससे आपसी सहयोग, पुनर्भरण (refueling), मरम्मत, रसद (logistics), संयुक्त अभ्यास, प्रशिक्षण, आपदा राहत व मानवीय मिशन सुगम बनेंगे।
एयरस्पेस और बंदरगाहों में पारस्परिक पहुँच से जहाजों और विमानों की आवाजाही आसान होगी।
इस फैसले पर रियायत देते हुए, Duma स्पीकर Vyacheslav Volodin ने कहा कि यह निर्णय भारत-रूस के “रणनीतिक और समग्र” साझेदारी को और मजबूत बनाएगा।
यह मंजूरी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तब आई है जब Vladimir Putin 4–5 दिसंबर 2025 को “23वां भारत-रूस वार्षिक सम्मेलन” (Annual Summit) के लिए भारत आने वाले हैं।
🌐 रणनीतिक मायने
RELOS से भारत और रूस दोनों को लॉजिस्टिक सपोर्ट, एयरस्पेस व्यूह, पोर्ट कॉल व सैन्य परिवहन सुविधाओं तक आपसी एक्सेस मिलेगी — जो आपात स्थिति, संयुक्त अभ्यास या आपदा राहत में बेहद काम आएगी।
यह समझौता भारत की बहुपक्षीय रक्षा-व्यवस्था रुख को दर्शाता है — जहां देश पुरानी साझेदारियों के साथ-साथ नए रक्षा-फ्रेमवर्क बनाए रख रहा है।
रूस की ओर से इसे एक भरोसेमंद मित्र के तौर पर भारत की स्थिति को दोहराया गया है; इससे रूस-भारत रक्षा-व्यवहार गहराने की दिशा में एक मजबूत संकेत जाता है।
वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों और पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच, यह रक्षा-साझेदारी भारत के लिए रणनीतिक विकल्पों को बनाए रखने में मददगार साबित हो सकती है।
📝 निष्कर्ष
RELOS समझौते की मंजूरी, 2025 में भारत-रूस रक्षा-साझेदारी के लिए एक नया अध्याय है। यह फैसला न सिर्फ तकनीकी और लॉजिस्टिक रूप में मददगार है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक समीकरणों में भारत की स्थिति को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
