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2 Mar 2026, Mon

✍️ संपादकीय – 6 दिसंबर : इतिहास का वो ज़ख्म जो अब भी हरा है

6 दिसंबर… भारत के इतिहास की वह तारीख़, जो आज भी साम्प्रदायिक तनाव, धार्मिक असुरक्षा और राजनीतिक स्वार्थ की याद दिलाती है।


6 दिसंबर 1992 — वह दोपहर जिसने भारतीय लोकतंत्र और धार्मिक सौहार्द दोनों को गहरा आघात पहुँचाया।
एक मस्जिद गिराई गई… और साथ ही विश्वास भी।
बाबरी मस्जिद — सिर्फ़ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं था, बल्कि इतिहास, इबादत और पहचान की विरासत थी। मगर उस दिन, भारतीय न्याय व्यवस्था, प्रशासनिक तंत्र और संविधान की सुरक्षा भीड़ के जुनून के सामने हार गया। सबसे बड़ा प्रश्न तब भी था… और आज भी है — आख़िर ऐसा कैसे होने दिया गया?
⚫ वादे थे सुरक्षा के, पर हकीकत में टूटी थी चुप्पी
सर्वोच्च न्यायालय ने “स्थिति यथावत बनाए रखने” का आदेश दिया था।
सरकार ने मस्जिद को सुरक्षा देने की गारंटी दी थी।
लेकिन जब लाखों की भीड़ अयोध्या में एकत्र हुई, नारे लगे, मंच से भड़काऊ भाषण हुए — तब प्रशासन के हाथ अचानक बेहद कमज़ोर पड़ गए। सवाल तैरता रहा — भीड़ बेकाबू हुई, या जानबूझकर बेकाबू होने दी गई?
⚫ इतिहास बनाम दावे — और राजनीति की आँच
1528 से खड़ी बाबरी मस्जिद एक धार्मिक स्थल रही है।
मगर 1990 के दशक में मंदिर-ध्वंस के दावों, इतिहासकारों के विरोधाभासी मतों और राजनीतिक भाषणों ने इस मसले को धीरे-धीरे चुनावी ईंधन बना दिया।
धर्म के नाम पर की गई राजनीति ने भावनाओं को इस कदर भड़काया कि तर्क और कानून पीछे छूट गए —
और हर तरफ़ सिर्फ़ एक नारा गूंजने लगा:
“मंदिर वहीं बनाएंगे।”
⚫ कारसेवा के नाम पर आंदोलन — और फिर वही काला दोपहर
6 दिसंबर की दोपहर को जो हुआ, वह स्वतःस्फूर्त नहीं था।
हजारों कारसेवकों के हाथों में रॉड, हथौड़े, औज़ार थे — ये किसी शांति रैली के औज़ार नहीं थे।
भीड़ दीवारों पर चढ़ी, गुंबद पर हथौड़े चले, और कुछ ही घंटों में 400 साल पुरानी मस्जिद ध्वस्त हो गई।
धूल का बादल तो बैठ गया — लेकिन मन का तूफ़ान आज भी थमा नहीं है।
⚫ कौन ज़िम्मेदार? — जवाब किसके पास नहीं
उस दिन प्रशासन मौन रहा।
कानून पीछे हट गया।
लेकिन 20 करोड़ लोगों के दिलों में सवाल गूंजता रह गया —
क्या सुरक्षा देने का वादा झूठ था?
क्या भीड़ के पीछे कोई योजना थी?
और इंसाफ़ का रास्ता कौन रोके बैठा था?
⚫ 33 साल बाद — क्या बदला?
आज 6 दिसंबर 2025 है।
तारीख वही है… याद वही… दर्द वही।
कानूनी फैसले बदल सकते हैं, राजनीतिक नक्शा बदल सकता है, लेकिन एक समुदाय के ज़ख्म — भावनाओं और यादों के — आसानी से नहीं भरते।
बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के साथ एक अहम सबक भी दुनिया के सामने आया —
जब धर्म राजनीति का हथियार बन जाता है, तब समाज की आत्मा घायल होती है।
⚫ आज क्यों याद किया जाता है यह दिन?
क्योंकि यह सिर्फ़ एक मस्जिद के टूटने की कहानी नहीं है —
यह विश्वास टूटने, कानून के हारने और लोकतंत्र के कमजोर पड़ने की कहानी है।
और इसलिए मुस्लिम समुदाय ही नहीं, भारत की धर्मनिरपेक्ष आत्मा भी इस दिन को “Black Day” के नाम से याद करती है।
🔻 अंतिम बात — इतिहास मिटाया नहीं जा सकता
बाबरी मस्जिद अब खंडहरों में नहीं है, लेकिन उसकी याद इतिहास की किताबों में, दिलों में और दुख की महीन परतों में अब भी दर्ज है।
लोगों की आस्था बदल सकती है… राजनीतिक हालात बदल सकते हैं…
मगर दर्द कभी संशोधित नहीं होता।
सवाल आज भी ज़िंदा है —
क्या कभी इस ज़ख्म को न्याय मिल पाएगा?
और क्या भारत फिर कभी उस सौहार्द और भाईचारे तक लौट पाएगा जिसकी नींव पर यह देश खड़ा हुआ था?
📌 6 दिसंबर —
याद, चेतावनी और ज़िम्मेदारी — तीनों का दिन।
ताकि इतिहास दोबारा न लिखा जाए,
और देश फिर किसी धार्मिक जुनून का शिकार न बने।

सूफ़ी- एजाज़ आलम खान क़ादरी

संपादक-AKP News 786