अमरोहा (उत्तर प्रदेश)।
एक कच्चे मकान की खामोशी उस वक्त चीख़ों में बदल गई, जब 26 दिन के एक मासूम की ज़िंदगी सुबह की पहली किरण से पहले ही बुझ चुकी थी। यह हादसा इतना दर्दनाक है कि सुनने वाला भी सिहर उठे। मां-बाप की गोद में सुकून से सोने वाला नवजात, अपने ही पिता के नीचे दबकर दम तोड़ बैठा।
मृतक मासूम का नाम सुफियान था। वह अपने माता-पिता सद्दाम अब्बासी और आसमा के साथ रात में दूध पीकर सोया था। घर छोटा था, जगह कम थी और तीनों एक ही बिस्तर पर सो गए। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि वही रात परिवार की ज़िंदगी का सबसे काला सवेरा बन जाएगी।
सुबह जब मां आसमा ने रोज़ की तरह अपने बेटे को दूध पिलाने के लिए जगाने की कोशिश की, तो सुफियान ने कोई हरकत नहीं की। पहले तो उन्होंने सोचा कि बच्चा गहरी नींद में है, लेकिन जब बार-बार हिलाने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो मां की चीख निकल पड़ी। उस चीख ने पूरे मोहल्ले को झकझोर दिया।
मीडिया से बातचीत में ग़मगीन मां आसमा ने कांपती आवाज़ में बताया,
“रात में मेरे शौहर गहरी नींद में थे। करवट लेते समय बच्चा उनके नीचे दब गया। सांस रुक गई… हमें पता ही नहीं चला।”

बताया जा रहा है कि सद्दाम अब्बासी गहरी नींद में थे और रात के दौरान अनजाने में उन्होंने करवट ले ली। उसी दौरान नवजात पिता के सीने के नीचे दब गया, जिससे उसका दम घुट गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गई।
परिवार की हालत बेहद साधारण है। सद्दाम और आसमा एक कच्चे मकान में रहते हैं और पेड़-पौधों की नर्सरी लगाकर किसी तरह अपना गुजर-बसर करते हैं। सुफियान उनका इकलौता बेटा था, जिससे उन्होंने बड़े-बड़े सपने संजो रखे थे। घर में बच्चे के आने से जो रौनक आई थी, वह सिर्फ 26 दिन में मातम में बदल गई।
मासूम की मौत की खबर जैसे ही परिवार और पड़ोसियों तक पहुंची, पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। सद्दाम और आसमा फूट-फूटकर रो पड़े। दर्द इतना गहरा था कि दोनों खुद को संभाल नहीं पाए। ग़म के बीच दोनों ने एक-दूसरे पर लापरवाही के आरोप लगाते हुए झगड़ा भी शुरू कर दिया।
कभी मां खुद को दोष देती, तो कभी पिता अपनी किस्मत को कोसते नज़र आए। परिजनों और पड़ोसियों ने किसी तरह समझा-बुझाकर दोनों को शांत कराया।
मां आसमा का दर्द शब्दों में बयान करना मुश्किल है। वह बार-बार बच्चे के कपड़े और छोटे-छोटे खिलौने उठाकर रो पड़ती हैं। कभी पालने की तरफ देखती हैं, कभी उस बिस्तर को निहारती हैं जहां उनका बच्चा आखिरी बार सोया था।
“अभी तो उसने ठीक से दुनिया भी नहीं देखी थी,” कहते हुए वह बेहोश सी हो जाती हैं।
यह हादसा एक बार फिर उस कड़वी सच्चाई को सामने लाता है, जहां गरीबी, जागरूकता की कमी और मजबूरी मिलकर मासूम जिंदगियों को निगल जाती हैं। छोटे घरों में माता-पिता के साथ नवजात का एक ही बिस्तर पर सोना आम बात है, लेकिन इसके खतरों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर परिवार को थोड़ी जागरूकता या सुरक्षित व्यवस्था मिली होती, तो शायद सुफियान आज जिंदा होता। यह घटना न सिर्फ एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि समाज के लिए भी चेतावनी है।
अमरोहा का यह हादसा उन अनगिनत गुमनाम कहानियों में शामिल हो गया है, जहां एक मासूम की सांसें वक्त से पहले थम जाती हैं और पीछे रह जाते हैं सिर्फ आंसू, पछतावा और कभी न भरने वाला खालीपन।
आज सद्दाम और आसमा के घर में सन्नाटा है। वह घर, जहां कुछ दिन पहले बच्चे की किलकारियां गूंजती थीं, अब वहां सिर्फ मातम और खामोशी है। सुफियान चला गया, लेकिन अपने पीछे एक ऐसा दर्द छोड़ गया है, जो शायद उम्र भर उसके मां-बाप के दिल में धड़कता रहेगा।
