शब-ए-बारात इस्लामिक कैलेंडर के शाबान महीने की 14वीं और 15वीं तारीख की दरम्यानी रात को मनाई जाने वाली एक पवित्र रात है। इसे क्षमा एवं इबादत की रात माना जाता है।
इस रात मुसलमान रात-भर जागकर नमाज़ पढ़ते हैं, क़ुरआन पढ़ते हैं, अपने गुनाहों की माफी (तौबा) माँगते हैं और कब्रिस्तानों में जाकर पूर्वजों के लिए दुआ करते हैं। इसे निजात की रात (गुनाहों से मुक्ति) भी कहा जाता है।
शब-ए-बारात कैसे मनाई जाती है?
इबादत – लोग घरों में और मस्जिदों में शब-भर जागकर नफ़्ल नमाज़ें (विशेष प्रार्थनाएँ), सलातुल तस्बीह और क़ुरआन की तिलावत करते हैं।
तौबा और माफी – अल्लाह से अपने पापों के लिए माफी माँगी जाती है और भविष्य में अच्छे काम करने का संकल्प लिया जाता है।
कब्रिस्तान जाना – अपने दिवंगत पूर्वजों की मग़फिरत (आत्मा की शांति) के लिए कब्रिस्तान जाकर दुआ की जाती है।
दान – गरीब एवं ज़रूरतमंदों को खाना खिलाना, कपड़े देना तथा दान करना (सदका) इस रात का हिस्सा है।
रोज़ा – 15वीं शाबान यानी शब-ए-बारात की रात के अगले दिन, रमज़ान से पहले कई मुसलमान रोज़ा रखते हैं।

शब-ए-बारात का महत्व
गुनाहों से माफी – मान्यता है कि इस रात अल्लाह अपने बंदों की दुआएँ क़बूल करता है और सच्चे दिल से माँगी गई माफी (तौबा) को स्वीकार कर गुनाह माफ करता है।
तक़दीर का फ़ैसला – यह माना जाता है कि इस रात अल्लाह आगामी वर्ष के लिए लोगों की तक़दीर (भाग्य), जीवन एवं मृत्यु का फ़ैसला करता है।
रमज़ान की तैयारी – शब-ए-बारात इस बात का संकेत है कि पवित्र रमज़ान का महीना क़रीब है।
आत्मिक शुद्धि – यह इंसान को बीते समय की गलतियों से सीख लेकर एक बेहतर इंसान बनने और ख़ुदा के क़रीब जाने का अवसर देती है।
भारत के कुछ क्षेत्रों में इस रात मोमबत्तियाँ या दीपक जलाने और हलवा बनाने की परंपरा है, लेकिन कई इस्लामिक विद्वान इससे बचने और केवल सादगी के साथ इबादत करने की सलाह देते हैं।
लेखक: परमानन्द मिश्रा
AKP News 786

