शहादत-ए-शेर-ए-ख़ुदा – 21 रमज़ान
21 रमज़ान इस्लामी तारीख़ का वह दर्दनाक और ग़मगीन दिन है, जब शेर-ए-ख़ुदा, अमीर-उल-मोमिनीन, इमाम-उल-मुत्तक़ीन हज़रत अली इब्न अबी तालिब ने शहादत का जाम पिया।

यह वही अज़ीम शख़्सियत हैं जो बचपन से ही दामन-ए-रसूल में पले-बढ़े। रहमतुल्लिल आलमीन प्यारे रसूल हज़रत मुहम्मद ﷺ चचेरे भाई, दामाद और अहले-बैत के रोशन सितारे थे। इल्म में दरिया, शुजाअत में शेर, अद्ल में मिसाल और इबादत में बेमिसाल थे।
साज़िश और हमला
40 हिजरी में ख़ारिजियों ने एक ख़ौफ़नाक साज़िश रची। उनमें से एक बदनसीब और बदबख़्त शख़्स अब्दुर्रहमान इब्न मुल्जिम को यह काम सौंपा गया कि वह अमीर-उल-मोमिनीन हज़रत अली को शहीद करे।
19 रमज़ान 40 हिजरी की सहर थी। कूफ़ा की मस्जिद में फ़ज्र की नमाज़ का वक़्त हुआ। हज़रत अली अल्लाह की बारगाह में हाज़िर हुए और नमाज़ की इमामत शुरू की।
जैसे ही आप सज्दे में गए, घात लगाए बैठे इब्ने मुलजिम ने ज़हर में बुझी हुई तलवार से आपके सर-ए-मुबारक पर वार कर दिया।
तलवार का वार बहुत गहरा था। खून बहने लगा, मगर उस हालत में भी इमाम-ए-अदल की ज़ुबान से सब्र और यक़ीन के ये लफ़्ज़ निकले:
“फ़ुज़्तु व रब्बिल काबा”
यानी काबे के रब की क़सम, अली कामयाब हो गया।
आख़िरी नसीहत
आपको घर लाया गया। ज़ख्म गहरा था और ज़हर अपना असर दिखा रहा था। मगर इस हालत में भी आपने अपने बेटों को वसीयत की:
अल्लाह से डरते रहना
नमाज़ को क़ायम रखना
यतीमों और ग़रीबों का ख़याल रखना
और मेरे क़ातिल के साथ भी इंसाफ़ करना
शहादत
दो दिन तक ज़ख्म की तकलीफ़ सहने के बाद 21 रमज़ान 40 हिजरी को यह अज़ीम हस्ती अपने रब से जा मिली और शहादत का बुलंद दर्जा पाया।
आज भी जब 21 रमज़ान आती है, तो मुसलमानों के दिल ग़म से भर जाते हैं। शेर-ए-ख़ुदा की शहादत हमें यह पैग़ाम देती है कि हक़, अद्ल और सच्चाई की राह में हर कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना चाहिए।
अल्लाह तआला अमीर-उल-मोमिनीन हज़रत अली पर अपनी रहमतें नाज़िल फरमाए और हमें उनकी सीरत पर चलने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन। 🤲
संकलनकर्ता – सूफ़ी एजाज़ आलम खान क़ादरी
संपादक-AKP News 786
अध्यक्ष-आलम रूहानी मिशन ट्रस्ट
