ईद-उल-फ़ित्र का मुबारक मौका जहाँ हर तरफ खुशियों, नए कपड़ों, मिठाइयों और रौनक का पैग़ाम लेकर आता है, वहीं यह त्योहार हमें इंसानियत, मोहब्बत और त्याग का असली मतलब भी सिखाता है। ऐसे ही पाक जज़्बातों को बेहद खूबसूरती से बयान किया है महान लेखक मुंशी प्रेमचंद ने अपनी मशहूर कहानी “ईदगाह” में।

इस कहानी का नन्हा किरदार हामिद, जो गरीबी और मजबूरी के बावजूद हौसले और समझदारी की मिसाल है, हमें यह एहसास कराता है कि ईद की खुशी सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि अपनों के लिए जीने का नाम है। जब दूसरे बच्चे मेले में खिलौने, मिठाइयाँ और झूले का आनंद लेते हैं, तब हामिद अपने लिए कुछ भी नहीं खरीदता।
सिर्फ तीन पैसों में वह एक साधारण सा चिमटा खरीदता है—लेकिन यह चिमटा उसकी दादी की तकलीफ को दूर करने का जरिया बनता है। यह छोटा सा तोहफा, दरअसल एक बच्चे की गहरी सोच, फिक्र और मोहब्बत की सबसे बड़ी मिसाल बन जाता है।
जब हामिद अपनी दादी को चिमटा देता है, तो वह लम्हा सिर्फ एक तोहफा देने का नहीं, बल्कि दिलों को छू लेने वाला एहसास बन जाता है—जहाँ गरीबी भी अमीरी के आगे झुक जाती है।
✨ ईद का असली पैग़ाम यही है कि हम अपने आसपास के लोगों की खुशियों का ख्याल रखें, उनकी तकलीफ को समझें और अपने छोटे-छोटे त्याग से किसी के चेहरे पर मुस्कान लाएँ।
आज जब समाज दिखावे और खर्च की ओर बढ़ रहा है, हामिद की यह कहानी हमें सिखाती है कि असली ईद दिलों को जोड़ने में है, न कि जेब खर्च करने में।
✍️ AKP NEWS 786 की जानिब से पैग़ाम:
इस ईद, हामिद की तरह सोचिए…
किसी अपने की जरूरत को समझिए…
और अपनी खुशी में दूसरों को शामिल कीजिए…
क्योंकि यही है ईद की असली रौनक — मोहब्बत, खिदमत और इंसानियत।

संकलनकर्ता:- परमानन्द मिश्रा
