Breaking
17 Apr 2026, Fri

नमाज़: हर मोमिन की मेराज — शबे-मेराज की रात और सूफ़ी एजाज़ आलम ख़ान क़ादरी की रूहानी आवाज़

By Aijaz Alam Khan

शबे-मेराज कोई साधारण रात नहीं—यह रूह के जागने, दिल के पिघलने और बंदे के अल्लाह से मिलने की मुक़द्दस घड़ी है। यह वही शब है जब ज़मीन-ओ-आसमाँ के फ़ासले मिट गए, और मोहब्बत-ए-इलाही ने अपने महबूब, प्यारे रसूल हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ को अपने क़रीब बुला लिया। इसी रात का सबसे बड़ा तोहफ़ा नमाज़ है!


27 रजब 1447 हिजरी — शबे-मेराज 2026
भारत में: 16 जनवरी 2026 मगरिब के बाद, शाम से
17 जनवरी 2026 फ़ज्र, सुबह तक!
सूफ़ियों की नज़र में मेराज महज़ एक सफ़र नहीं, बल्कि फ़ना से बक़ा तक की मंज़िल है—जहाँ “मैं” मिटती है और “वह” बाक़ी रहता है।—सूफ़ियाना राह का सर्वोच्च ज़िक्र; जहाँ लब ख़ामोश हो जाते हैं और दिल बोलने लगता है, जहाँ सजदा इंसान को आसमानों से भी ऊँचा उठा देता है।
शबे-मेराज हमें यह भी सिखाती है कि जब ज़िंदगी इम्तिहान बन जाए, रास्ते अँधेरे लगें और नफ़्स का शोर बढ़ जाए—तो सब्र, इश्क़ और यक़ीन का दिया जलाए रखना चाहिए। यही दिया रूह को मेराज की ऊँचाइयों तक ले जाता है।
सूफ़ियाना पैग़ाम
सूफ़िया-ए-किराम फ़रमाते हैं:
“मेराज नबी ﷺ की है, मगर नमाज़ हर मोमिन की मेराज है।”
यानी जो बंदा सच्चे दिल से सजदे में झुकता है, वह रूहानी तौर पर अल्लाह के और क़रीब हो जाता है।
आज के दौर में, जब दिलों के बीच फ़ासले बढ़ते जा रहे हैं और नफ़्स का शोर इंसानियत को ढक रहा है, शबे-मेराज हमें मोहब्बत, अदब और रहमत का पैग़ाम देती है। यह रात याद दिलाती है कि अल्लाह तक पहुँचने का रास्ता आसमानों में नहीं—दिल के अंदर से होकर जाता है।
आइए, इस शबे-मेराज पर
दिल को पाक करें,
नफ़्स को झुकाएँ,
इस लेख के जरिये से मेरा यानि सूफ़ी एजाज़ आलम खान क़ादरी का कहना है की रूह की गिज़ा कल्ब की पाकीज़गी के साथ नमाज़ कायम करना है!
दर-ए-इलाही पर यह दुआ करें—
“ऐ अल्लाह, हमें भी अपने क़रीब कर ले।”, आमीन!

—सूफ़ी एजाज आलम खान क़ादरी
प्रिंसिपल दारुल उलूम इस्लामिया फैज़ाने आलम
परसा दमया, जनपद बस्ती
संपर्क नम्बर 9451437422