गोरखपुर जिला जेल में चौरी-चौरा विद्रोह की 105वीं वर्षगांठ पर ऐतिहासिक चेतना का जागरण
गोरखपुर। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम इतिहास में अमिट छाप छोड़ने वाले चौरी-चौरा विद्रोह की 105वीं वर्षगांठ तथा 77वें गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा गोरखपुर जिला जेल परिसर में एक दिवसीय ऐतिहासिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेजों की विशेष प्रदर्शनी और बंदियों के साथ संवाद कार्यक्रम आयोजित हुआ।
कार्यक्रम प्रातः 10 बजे से दोपहर 4 बजे तक चला, जिसमें स्वतंत्रता संग्राम की चेतना, राष्ट्रप्रेम और ऐतिहासिक मूल्यों को सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया। आयोजन का मुख्य उद्देश्य चौरी-चौरा विद्रोह के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करने के साथ-साथ कारागार में निरुद्ध बंदियों के बीच राष्ट्रीय चेतना और आत्मगौरव की भावना को जागृत करना था।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गूंजा राष्ट्रप्रेम
कार्यक्रम की शुरुआत सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से हुई, जिसमें देशभक्ति गीतों और विचारोत्तेजक कार्यक्रमों के माध्यम से राष्ट्रप्रेम की भावना को प्रबल किया गया। इन प्रस्तुतियों ने उपस्थित बंदियों, जेल प्रशासन के अधिकारियों और आमंत्रित अतिथियों को भावविभोर कर दिया।
चौरी-चौरा विद्रोह पर ऐतिहासिक संबोधन
संवाद सत्र में महुआ डाबर संग्रहालय के महानिदेशक एवं महुआ डाबर एक्शन के क्रांतियोद्धा शहीद जफर अली के वंशज डॉ. शाह आलम राणा ने चौरी-चौरा विद्रोह की 105वीं वर्षगांठ के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि चौरी-चौरा की घटना केवल एक स्थान विशेष तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनआक्रोश और जनचेतना का प्रतीक थी।
उन्होंने बताया कि 4 फरवरी 1922 को घटित इस विद्रोह ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा को गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन को स्थगित करने का निर्णय लिया गया, किंतु चौरी-चौरा के शहीदों का बलिदान इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया।

दुर्लभ दस्तावेजों की प्रदर्शनी रही आकर्षण का केंद्र
प्रदर्शनी इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रही, जिसमें चौरी-चौरा आंदोलन से जुड़े अनेक दुर्लभ और प्रमाणिक दस्तावेज प्रदर्शित किए गए। इनमें ब्रिटिशकालीन सरकारी अभिलेख, ऐतिहासिक छायाचित्र, उस दौर के समाचार पत्रों की रिपोर्टिंग, टेलीग्राम संदेश और अदालती अभिलेख शामिल थे।
इन दस्तावेजों के माध्यम से दर्शकों को चौरी-चौरा आंदोलन की पृष्ठभूमि, घटनाक्रम और उसके दूरगामी प्रभावों को समझने का अवसर मिला। बंदियों में प्रदर्शनी को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिला और उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े प्रश्न भी पूछे।
जेल प्रशासन की सराहनीय भूमिका
कार्यक्रम के दौरान प्रभारी जेल अधीक्षक अरुण कुमार कुशवाहा ने कहा कि इस प्रकार के आयोजन बंदियों के मानसिक, बौद्धिक और नैतिक विकास में सहायक होते हैं। इतिहास और राष्ट्रनिर्माण से जुड़ाव बंदियों में सकारात्मक सोच और सुधार की भावना उत्पन्न करता है।

सम्मान और प्रेरणादायी संदेश के साथ समापन
कार्यक्रम के समापन अवसर पर प्रभारी जेल अधीक्षक अरुण कुमार कुशवाहा द्वारा महुआ डाबर संग्रहालय के महानिदेशक डॉ. शाह आलम राणा को सम्मानित किया गया। उन्होंने इस ऐतिहासिक और प्रेरणादायी आयोजन के लिए संग्रहालय की टीम की भूरी-भूरी प्रशंसा की।
समग्र रूप से यह आयोजन चौरी-चौरा विद्रोह की 105वीं वर्षगांठ और गणतंत्र दिवस का स्मरणीय उत्सव बना। साथ ही यह संदेश भी दे गया कि इतिहास से जुड़कर ही वर्तमान को बेहतर और भविष्य को उज्ज्वल बनाया जा सकता है।
रिजवान खान की रिपोर्ट
AKP News 786
