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22 Jul 2026, Wed

दो साल का हुआ नीम का पेड़, सूफी एजाज आलम खान कादरी ने दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश ⭐

By Editor Aijaz Alam Khan

बस्ती। पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने के उद्देश्य से लगाया गया नीम का पौधा अब दो वर्ष पूरा कर चुका है। जुलाई 2024 में दारुल उलूम इस्लामिया फैजाने आलम, परसा दमया परिसर में प्रधानाचार्य सूफी एजाज आलम खान कादरी ने दमया निवासी मजीबुल्लाह चाचा के साथ मिलकर इस पौधे का रोपण किया था। दो वर्षों की देखभाल के बाद यह पौधा अब एक मजबूत और हरे-भरे वृक्ष का रूप लेने लगा है, जो पर्यावरण संरक्षण के प्रति समाज को प्रेरित कर रहा है।
इस अवसर पर पौधे का निरीक्षण करते हुए प्रधानाचार्य सूफी एजाज आलम खान कादरी ने कहा कि पेड़-पौधे मानव जीवन के सबसे बड़े साथी हैं। उन्होंने कहा कि नीम का पेड़ केवल छाया ही नहीं देता, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण औषधीय वृक्ष भी है। इसकी पत्तियां, छाल, फल और टहनियां अनेक प्रकार की आयुर्वेदिक औषधियों में उपयोग की जाती हैं। नीम वातावरण को शुद्ध रखने के साथ-साथ वायु प्रदूषण को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


उन्होंने कहा कि आज के समय में बढ़ते प्रदूषण और लगातार घटते हरित क्षेत्र चिंता का विषय हैं। ऐसे समय में प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में कम से कम एक पौधा अवश्य लगाना चाहिए और उसकी नियमित देखभाल भी करनी चाहिए। केवल पौधारोपण करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे वृक्ष बनने तक संरक्षित रखना भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
सूफी एजाज आलम खान कादरी ने कहा कि इस नीम के पौधे को दो वर्षों तक निरंतर देखभाल और संरक्षण मिला, जिसके कारण यह आज स्वस्थ रूप में विकसित हो रहा है। उन्होंने बताया कि आने वाले वर्षों में यही वृक्ष आसपास के वातावरण को शुद्ध करेगा, लोगों को छाया देगा और अनेक पक्षियों का आश्रय स्थल भी बनेगा।
दमया निवासी मजीबुल्लाह चाचा ने भी इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि पौधारोपण का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होता है जब पौधा सुरक्षित रहकर बड़ा वृक्ष बने। उन्होंने लोगों से अपील की कि अपने घर, विद्यालय, मदरसा, मस्जिद और सार्वजनिक स्थानों पर अधिक से अधिक पौधे लगाएं तथा उनकी नियमित देखभाल करें। इससे आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वातावरण और बेहतर जीवन मिल सकेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार नीम को भारत के सबसे उपयोगी वृक्षों में गिना जाता है। इसकी पत्तियों में जीवाणुरोधी और विषाणुरोधी गुण पाए जाते हैं। आयुर्वेद में इसका उपयोग त्वचा रोग, दांतों की सुरक्षा, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने तथा कई अन्य रोगों के उपचार में किया जाता है। यही कारण है कि नीम को “औषधियों का भंडार” भी कहा जाता है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि एक विकसित वृक्ष प्रतिवर्ष बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन प्रदान करता है। इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में भी सहायता मिलती है। यदि प्रत्येक नागरिक नियमित रूप से पौधारोपण करे और पौधों की देखभाल को अपनी जिम्मेदारी समझे तो आने वाले समय में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़े सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।


दारुल उलूम इस्लामिया फैजाने आलम में समय-समय पर पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता और सामाजिक जागरूकता से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। संस्था का उद्देश्य केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों में सामाजिक जिम्मेदारी, प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण की भावना विकसित करना भी है। नीम का यह वृक्ष उसी सोच का जीवंत प्रतीक बनकर आज सभी को हरियाली और स्वच्छ वातावरण का संदेश दे रहा है। इस मौके पर नायब सदर हाफिज व कारी मोहम्मद असलम कादरी, हाफिज नूर मोहम्मद, रिजवान खान, फातमा इदरीसी, शाहीन खातून, कु० संजना, इकरा खातून, शैलेन्द्र कुमार, सावित्री देवी की भूमिका सराहनीय है ।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित लोगों ने संकल्प लिया कि वे अपने आसपास अधिक से अधिक पौधे लगाएंगे, उनकी नियमित देखभाल करेंगे तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति समाज को जागरूक बनाने में सक्रिय भूमिका निभाएंगे। सभी ने इस बात पर जोर दिया कि यदि हर व्यक्ति अपने जीवन में एक पौधा लगाकर उसे वृक्ष बनने तक सुरक्षित रखे, तो पृथ्वी को अधिक हरा-भरा और प्रदूषण मुक्त बनाया जा सकता है।

AKP NEWS 786

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